- जीवन के अनुभव का भजन
- किसके लिए जीना चाहिए इंसान को
- I
- साफ़ नहीं था इंसान जीए किसके लिए।
- अब मिल गया है मुझे उसका जवाब।
- प्रतिष्ठा और शोहरत की तलाश में, मैं जीता था बस अपने लिए।
- सुंदर शब्दों से भरी होती थी मेरी दुआ,
- पर असल में मैं जीता था अपने तरीके से।
- भविष्य और किस्मत पर था निर्भर मेरा ईमान,
- नहीं मेरी कोई सच्चाई और असलीयत।
- रस्मों-रिवाज़, नियम सीमित करते थे मेरे ईमान को, मेरे ईमान को।
- खालीपन के अलावा नहीं था कुछ भी मेरे पास, मेरे पास।
- इंसान की तरह जीने में नाकामयाब,
- परमेश्वर के प्रेम के लायक नहीं हूँ मैं, नहीं हूँ मैं, नहीं हूँ मैं।
- II
- मेरा दिल जाग उठा है अब,
- कहता है मुझे लौटाना चाहिए परमेश्वर का प्रेम।
- ख़ुद से है मुझे नफ़रत कि नहीं था मेरा कोई ज़मीर,
- परमेश्वर की करता अवज्ञा और तोड़ता उसका दिल, और तोड़ता उसका दिल।
- कभी नहीं थी परवाह मुझे परमेश्वर के दिल की,
- कभी नहीं थी परवाह मुझे उनके वचनों की।
- बिना ज़मीर और बिना समझ,
- कैसे कोई बुला सकता है मुझे इंसान?
- परमेश्वर का न्याय दिखाता है मुझे,
- शैतान ने कर दिया था पूरी तरह दूषित मुझे।
- जालों से भरी ये दुनिया है बुरी,
- एक विश्वासी को चुनना चाहिए सत्य।
- हे प्रभु, मुझसे कितना प्रेम तुम करते हो,
- बचाने के लिए मुझे जो हो मुमकिन सब करते हो।
- तुमने जो किया मेरे लिए, याद रहेगा मुझे हमेशा!
- मैं भूलूँगा नहीं कभी।
- परमेश्वर के दिल का ख्याल, यही है मेरी ख़्वाहिश।
- हक़ीक़त पर चलने का मेरा पक्का इरादा, इरादा पक्का इरादा।
- परमेश्वर के लिए खुद को खर्च करने का है मेरा इरादा,
- ख़ुद को अर्पित करके है चुकाना उसका प्रेम,
- ख़ुद को अर्पित करके है चुकाना उसका प्रेम।
- "मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना" से
- Source From:सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया-जीवन के लिए संगीत
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