- अपने वचनों और कार्यों को कैसे समझना चाहिये तुम्हें
- I
- क्या परमेश्वर के वचनों में, प्रतिकार में विश्वास है तुम्हें?
- कि सज़ा देगा वो उन्हें जो कपट करते हैं, धोखा देते हैं उसे?
- तुम चाहते हो वो दिन जल्दी आए या बाद में?
- क्या ख़ौफ खाते हो तुम सज़ा से,
- या सज़ा है, ये जानकर भी परमेश्वर का विरोध करोगे?
- और जब आएगा वो दिन तो
- रोओगे या ख़ुशियाँ मनाओगे तुम?
- आशावान हो या भयभीत हो तुम
- कि पूरे होंगे परमेश्वर के सभी वचन?
- अगर उम्मीद है तुम्हें परमेश्वर शीघ्र प्रस्थान करेगा,
- अपने वचनों को पूरा करने,
- तो कैसे समझना चाहिये अपने शब्दों और कामों को तुम्हें?
- अगर इसके होने की उम्मीद नहीं तुम्हें,
- तो विश्वास ही क्यों करते हो तुम परमेश्वर में?
- II
- किस तरह के अंत की कामना है तुम्हें?
- परमेश्वर में विश्वास है या शक है तुम्हें?
- क्या विचारे हैं वो नतीजे और अंत तुमने,
- जो लाएंगे काम और बर्ताव तुम्हारे?
- आशावान हो या भयभीत हो तुम
- कि पूरे होंगे परमेश्वर के सभी वचन।
- अगर उम्मीद है तुम्हें परमेश्वर शीघ्र प्रस्थान करेगा,
- अपने वचनों को पूरा करने,
- तो कैसे समझना चाहिये अपने शब्दों और कामों को तुम्हें?
- अगर इसके होने की उम्मीद नहीं तुम्हें,
- तो विश्वास ही क्यों करते हो तुम परमेश्वर में?
- III
- क्या जानते हो क्यों करते हो अनुसरण परमेश्वर का तुम?
- अपने ज्ञान की सीमाओं को बढ़ाने के लिये करते हो अगर,
- फिर ज़रूरी नहीं सहो इन परेशानियों को तुम।
- लेकिन धन्य होने, आपदा से बचने के लिये करते हो अगर,
- तो फिर चिंतित क्यों नहीं हो तुम अपने आचरण को लेकर?
- क्यों नहीं पूछते हो ख़ुद से तुम,
- क्या पूरा कर सकते हो परमेश्वर की माँगों को तुम?
- या भविष्य की आशीषों को पाने के लायक हो तुम?
- अगर उम्मीद है तुम्हें परमेश्वर शीघ्र प्रस्थान करेगा,
- अपने वचनों को पूरा करने,
- तो कैसे समझना चाहिये अपने शब्दों और कामों को तुम्हें?
- अगर इसके होने की उम्मीद नहीं तुम्हें,
- तो विश्वास ही क्यों करते हो तुम परमेश्वर में?
- "वचन देह में प्रकट होता है" से
- Source From:सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया-आराधना के गी
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