- विजय कार्य का अंदरूनी अभिप्राय
- I
- लौटना परमेश्वर के पास फिर से, हैं इंसान की जीत के अंदरूनी मायने।
- त्याग कर शैतान को पूरी तरह लौटना है पास परमेश्वर के, इंसान को।
- है यही पूरी तरह इंसान का उद्धार। मुश्किलों भरी जीत है जंग आखिरी।
- आख़िरी पड़ाव है ये परमेश्वर के विजय-लक्ष्य का।
- बच नहीं सकता बिना इसके कोई इंसान, जीता जा नहीं सकता है शैतान,
- लक्ष्य बेहतर पा नहीं सकता कोई इंसान।
- शैतान के पंजे में है हर कोई इंसान।
- है ज़रूरी पहले हार हो शैतान की, ताकि फिर इंसानों का उद्धार हो।
- क्योंकि हर काम परमेश्वर का है इंसान की ख़ातिर।
- II
- जीत आखिरी लाए उद्धार, और प्रकाशित करे मंज़िल को।
- इंसान पश्चाताप करता, न्याय हो जाने के बाद, चल पड़ता है सही राह पर।
- जाग जायेंगे ह्रदय उनके भी जो कि सुन्न हैं।
- होगा उनका फ़ैसला जो हैं हठीले, अंदरूनी द्रोह खुलकर आयेगा।
- जो मगर इंसान ना पछतायेगा, धर्मिता की राह पर ना आयेगा,
- और ना छोड़ेगा जो दोष अपने,
- उसकी ना मुक्ति है, ना उद्धार है, उसको शैतान निगल जायेगा।
- है यही मकसद परमेश्वर की जीत का--इंसान को बचाना और उसका अंत दिखलाना,
- है भला या कि बुरा है, जीत में परमेश्वर की, पता चल जायेगा।
- लौटना परमेश्वर के पास फिर से, हैं इंसान की जीत के अंदरूनी मायने।
- त्याग कर शैतान को पूरी तरह लौटना है पास परमेश्वर के, इंसान को।
- (इंसान को, इंसान को, इंसान को। )
- "वचन देह में प्रकट होता है" से
- Source From:सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया-सुसमाचारीय संगीत
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